गोपेश्वर (चमोली)। बदरीनाथ विधानसभा क्षेत्र के तीन प्रमुख महाविद्यालयों के छात्रसंघ चुनाव में तीन अलग-अलग संगठनों की जीत ने क्षेत्र की युवा राजनीति की तस्वीर बदल दी है। ज्योतिर्मठ में एबीवीपी, पोखरी में आर्यन छात्र संगठन और गोपेश्वर में एनएसयूआई के जीतने से साफ है कि कॉलेज परिसरों में युवाओं की पसंद एक दिशा में नहीं है। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले ये नतीजे भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए युवाओं के बीच अपनी पकड़ पर गौर करने का मौका दे रहे हैं।
सबसे ज्यादा चर्चा पोखरी महाविद्यालय के परिणाम की है। पोखरी भाजपा और कांग्रेस की राजनीति का मजबूत केंद्र रहा है। मौजूदा कांग्रेस विधायक लखपत बुटोला का गृह क्षेत्र पोखरी है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट का गृह क्षेत्र भी यही है, जबकि कांग्रेस से भाजपा में शामिल हुए पूर्व कैबिनेट मंत्री राजेंद्र भंडारी भी पोखरी से ही आते हैं और बदरीनाथ सीट से भाजपा के सशक्त दावेदार हैं। ऐसे राजनीतिक रूप से प्रभावशाली क्षेत्र में एबीवीपी और एनएसयूआई जैसे प्रमुख दलों से जुड़े छात्र संगठनों के बजाय आर्यन छात्र संगठन की जीत ने राजनीतिक हलकों में सवाल खड़े किए हैं।
यह परिणाम भाजपा या कांग्रेस के खिलाफ सीधे जनादेश के तौर पर नहीं देखा जा सकता, लेकिन इतना जरूर है कि बड़े राजनीतिक चेहरों की मौजूदगी कॉलेज परिसर में अपने आप समर्थन में तब्दील नहीं हुई। स्थानीय मुद्दे, प्रत्याशी की व्यक्तिगत पकड़ और छात्रों के बीच संगठन की सक्रियता ने यहां अलग समीकरण बनाया।
गोपेश्वर महाविद्यालय में तस्वीर दूसरी रही। जिले के सबसे बड़े महाविद्यालय में एनएसयूआई ने अध्यक्ष समेत प्रमुख पदों पर कब्जा जमाया। अध्यक्ष पद पर किशन सिंह बर्तवाल को 1114 मत मिले, जबकि एबीवीपी के कपिल नेगी को 459 मत मिले। 655 मतों के अंतर से मिली जीत ने एनएसयूआई की स्थानीय छात्र राजनीति में मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई।
वहीं ज्योतिर्मठ महाविद्यालय में एबीवीपी ने अध्यक्ष पद पर जीत दर्ज कर यह संकेत दिया कि क्षेत्र में भाजपा से जुड़े छात्र संगठन का आधार कायम है। यानी एक ही विधानसभा क्षेत्र के तीन बड़े कॉलेजों से निकली तस्वीर तीन रंगों वाली है। ज्योतिर्मठ में एबीवीपी, पोखरी में आर्यन और गोपेश्वर में एनएसयूआई।
यही परिणाम बदरीनाथ की युवा राजनीति को दिलचस्प बनाते हैं। छात्रसंघ चुनाव को विधानसभा चुनाव का सीधा पैमाना नहीं माना जा सकता। दोनों चुनावों के मुद्दे, मतदाता और स्थानीय समीकरण अलग होते हैं। फिर भी कॉलेज चुनावों में सामने आए रुझान राजनीतिक दलों के लिए महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि यही परिसर आने वाले वर्षों के युवा राजनीतिक नेतृत्व की जमीन भी तैयार करते हैं।
इन चुनावों ने खासकर युवा मुद्दों को फिर केंद्र में ला दिया है। रोजगार, प्रतियोगी परीक्षाएं, उच्च शिक्षा, कॉलेजों में सुविधाएं, छात्रावास और पलायन जैसे मुद्दे पहाड़ के युवाओं के लिए अहम हैं। ऐसे में केवल पार्टी की पहचान या बड़े नेताओं के प्रभाव के भरोसे युवा मतदाताओं तक पहुंचना आसान नहीं होगा।
पोखरी का परिणाम इस लिहाज से सबसे ज्यादा ध्यान खींचता है। जिस इलाके में भाजपा और कांग्रेस के बड़े राजनीतिक चेहरे मौजूद हैं, वहां दोनों से अलग छात्र संगठन का उभरना बताता है कि कॉलेज की राजनीति में स्थानीय समीकरणों की अपनी ताकत है। दूसरी ओर गोपेश्वर में एनएसयूआई की बड़ी जीत और ज्योतिर्मठ में एबीवीपी की सफलता यह भी बताती है कि पारंपरिक छात्र संगठनों का प्रभाव खत्म नहीं हुआ है, बल्कि अलग-अलग क्षेत्रों में उसकी ताकत अलग है।
2027 के विधानसभा चुनाव से पहले अब इन परिणामों को राजनीतिक दल किस नजर से देखते हैं, यह महत्वपूर्ण होगा। क्या कॉलेजों में दिखाई दे रही अलग-अलग पसंद विधानसभा चुनाव तक भी कायम रहती है, या दल युवाओं के मुद्दों और स्थानीय नेतृत्व के जरिए नए समीकरण तैयार करते हैं। यह तो आने वाला समय बताएगा।
फिलहाल बदरीनाथ विधानसभा क्षेत्र के तीन महाविद्यालयों ने एक बात जरूर साफ कर दी है कि युवा राजनीति को किसी एक दल या संगठन के खाते में रखकर नहीं देखा जा सकता। छात्रसंघ चुनाव के ये नतीजे विधानसभा चुनाव का फैसला नहीं सुनाते, लेकिन 2027 की सियासत से पहले युवाओं के बीच बदलते स्थानीय समीकरणों की एक तस्वीर जरूर सामने रखते हैं।

