पहाड़ की मूलभूत सुविधाएं आज भी बड़ी चुनौती

गोपेश्वर (चमोली)। उत्तराखंड को बने 25 वर्ष से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन आज भी पहाड़ की सबसे बड़ी चिंता मूलभूत सुविधाओं की कमी है। राज्य गठन के समय लोगों का सपना था कि अलग राज्य बनने से दूरस्थ गांवों तक सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, बिजली, पानी और रोजगार जैसी सुविधाएं आसानी से पहुंचेंगी पर हकीकत यह है कि आज भी पहाड़ का बड़ा हिस्सा बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहा है।

पर्वतीय क्षेत्रों में सड़क सुविधा मौजूदा दौर में भी सबसे बड़ी समस्या है। कई गांव ऐसे हैं जहां तक पहुंचने के लिए लोगों को कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। बरसात के मौसम में भूस्खलन और सड़क बंद होने की घटनाएं आम हो जाती हैं। कई बार मरीज समय पर अस्पताल नहीं पहुंच पाते और गर्भवती महिलाओं को डोली या खाट के सहारे सड़क तक लाना पड़ता है।

स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति भी चिंताजनक बनी हुई है। पहाड़ के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों और संसाधनों की भारी कमी है। कई अस्पताल केवल रेफर सेंटर बनकर रह गए हैं। गंभीर मरीजों को इलाज के लिए देहरादून, ऋषिकेश या हल्द्वानी जाना पड़ता है। इससे गरीब और ग्रामीण परिवारों पर आर्थिक बोझ बढ़ता है। दूरस्थ क्षेत्रों में एम्बुलेंस सेवा और विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी बड़ी चुनौती बनी हुई है।

शिक्षा व्यवस्था भी लगातार कमजोर होती जा रही है। छात्र संख्या कम होने के कारण गांवों के स्कूल बंद किए जा रहे हैं। उच्च शिक्षा और तकनीकी संस्थानों की कमी के कारण युवाओं को बाहर जाना पड़ता है। इससे पलायन और तेज हो रहा है। कई विद्यालयों में शिक्षकों की कमी और संसाधनों का अभाव शिक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित कर रहा है।

पेयजल की समस्या भी पहाड़ के कई क्षेत्रों में गंभीर है। प्राकृतिक जल स्रोत सूख रहे हैं और गर्मियों में लोगों को पानी के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। कई गांवों में नियमित पेयजल आपूर्ति नहीं हो पा रही है। जल संकट का सीधा असर खेती और पशुपालन पर भी पड़ रहा है।

बिजली और इंटरनेट जैसी सुविधाओं में सुधार जरूर हुआ है, लेकिन दूरस्थ क्षेत्रों में वर्तमान में भी नेटवर्क और बिजली कटौती बड़ी समस्या है। डिजिटल इंडिया और ऑनलाइन शिक्षा के दौर में कमजोर इंटरनेट कनेक्टिविटी ग्रामीण युवाओं को पीछे धकेल रही है।

रोजगार की कमी भी मूलभूत संकट के रूप में सामने है। पहाड़ों में जंगली जानवरों के कारण खेती लाभकारी नहीं रह गई और स्थानीय स्तर पर उद्योगों का अभाव है। परिणामस्वरूप युवा शहरों और दूसरे राज्यों की ओर पलायन कर रहे हैं। गांव खाली हो रहे हैं और पारंपरिक संस्कृति तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था कमजोर होती जा रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि पहाड़ के विकास के लिए मैदानी क्षेत्रों जैसी योजनाएं नहीं, बल्कि भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार अलग नीति बनाने की जरूरत है। सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार को गांव स्तर तक मजबूत किए बिना पलायन रोकना संभव नहीं होगा।

दरअसल, पहाड़ केवल पर्यटन और धार्मिक यात्रा का केंद्र नहीं है, बल्कि लाखों लोगों का घर भी है। यदि मूलभूत सुविधाओं को मजबूत नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में पहाड़ और अधिक खाली होते जाएंगे। विकास की असली परिभाषा तभी पूरी होगी, जब दूरस्थ गांवों तक स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क, पानी और रोजगार जैसी सुविधाएं समान रूप से पहुंचेंगी।

 

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