त्रियुगीनारायण : जहां तीन युगों से जल रही है शिव-पार्वती विवाह की पावन अग्नि

रुद्रप्रयाग। उत्तराखंड की देवभूमि में स्थित त्रियुगीनारायण मंदिर हिंदू धर्म की आस्था, पौराणिक महत्व और सनातन परंपरा का अद्भुत संगम है। मान्यता है कि इसी पावन स्थल पर भगवान शिव और माता पार्वती का दिव्य विवाह संपन्न हुआ था। यही कारण है कि यह मंदिर देश-विदेश के श्रद्धालुओं और नवविवाहित जोड़ों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।

रुद्रप्रयाग जनपद में समुद्र तल से लगभग 1,980 मीटर की ऊंचाई पर स्थित त्रियुगीनारायण मंदिर को भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह स्थल के रूप में जाना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, विवाह समारोह में भगवान विष्णु ने माता पार्वती के भाई की भूमिका निभाई थी, जबकि भगवान ब्रह्मा ने पुरोहित बनकर वैदिक रीति-रिवाजों के अनुसार विवाह संस्कार संपन्न कराया था।

मंदिर के सामने स्थित अखंड धूनी इसकी सबसे बड़ी विशेषता है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि यह वही पवित्र अग्नि है, जो शिव-पार्वती विवाह के समय प्रज्वलित हुई थी और सत्य, त्रेता तथा द्वापर युग से लेकर आज तक निरंतर जल रही है। इसी वजह से इस स्थान का नाम ‘त्रियुगीनारायण’ पड़ा, जिसका अर्थ है—तीन युगों से विद्यमान।

मंदिर परिसर में स्थित ब्रह्मा शिला को विवाह वेदी माना जाता है। इसके अलावा यहां रुद्र कुंड, विष्णु कुंड और ब्रह्म कुंड नामक तीन पवित्र जलकुंड भी मौजूद हैं, जिनमें सरस्वती शिला से निकलने वाला जल प्रवाहित होता है। श्रद्धालु इन कुंडों में स्नान कर पूजा-अर्चना करते हैं।

धार्मिक मान्यताओं के साथ-साथ त्रियुगीनारायण आज आदर्श वैवाहिक स्थल के रूप में भी पहचान बना चुका है। अनेक दंपति भगवान शिव और माता पार्वती को आदर्श मानते हुए यहां विवाह संस्कार संपन्न कर जीवन की नई शुरुआत करते हैं।

केदारनाथ यात्रा मार्ग के निकट स्थित यह पवित्र धाम सोनप्रयाग से सड़क मार्ग द्वारा आसानी से पहुंचा जा सकता है। प्राकृतिक सौंदर्य, धार्मिक महत्व और पौराणिक विरासत के कारण त्रियुगीनारायण मंदिर उत्तराखंड के प्रमुख धार्मिक पर्यटन स्थलों में शामिल है।

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